Sunday, September 21, 2014

किसकी हक़ीक़त

It's 
ये किसकी हक़ीक़त जी रहे हो?
क्या ऊबते नहीं!

देखो, उस पार -
नज़्में पनपने के लिए तुम्हारी हथेलियों के इंतज़ार में हैं 
जो किरदार बन-बिगड़ रहे हैं,
कितनी कहानियाँ बुन चुके तुम्हारे इर्द-गिर्द 

आओ,
कि रंग भरे मौसम थिरक रहे हैं तुम्हारे लिये 
शहर, जो तुम्हारे क़दमों तले चल रहे हैं - बस और  उजड़ रहे हैं 

दुनिया ज़िंदा है हर ओर, 
और तुम हो कि साँस ले रहे हो, बस!

ये जो तुम गुज़ार रहे हो, ये तुम्हारी हक़ीक़त है,
या किसी और की 'वर्चुअल रिऐलिटी'?

Monday, September 23, 2013

Love... in a Metro / Aankhein teri kitni haseen

It's 
They were soul-mates. Or at least that was the way I saw it.

They both took the metro from Vaishali, the one that left around 7:30 am; and often enough ended up in the same metro and compartment. For some obscure feminist reason, she chose not to travel in the ladies compartment; but I guess that was just as well, for I hoped it'll bring them closer.

As fate would have it, one day, they ended up sitting together. And when a guy started making passes at her, he was man enough to ask him to keep his hands off her. Now, I felt this should have been a reason good enough for them to get to know each other; but even in the middle of saying thanks she was interrupted by a sudden "Aankhein teri kitni haseen...". It was his cellphone and he had to take it. She just smiled and started looking the other way. (What a random song to have as a ringtone!)

And then it was back to routine... the same boarding from Vaishali and getting down at Barakhamba Road. Frankly, it was getting frustrating. Didn't they see it? They were meant to be together and they had all this time, which they were wasting doing nothing. The universe was *literally* conspiring to bring them together and these two stupid souls were not even aware that the other existed!


Thankfully, the incident was not entirely without a result, because whenever she heard the familiar ringtone, she would look that way and steal a look at him. He was kind of cute, she thought. And the fact that he never looked her way gave him a mysterious air. She was slowly getting smitten, without ever having spoken to him.

He, on the other hand, was clueless as ever. If only there was some way for him to notice her ...

And then, it happened! It was an unusually quiet day in the metro, when she heard the ringtone. As if on cue, her eyes followed the sound. But that face was nowhere to be seen. She frantically started scanning every face. At the exact moment of the phone going off, he too started looking for whoever had the same ringtone as his. And then, their eyes met. Straight away he knew it was he her eyes sought, and wondered how he could have missed those enormous, wondrous eyes all this time. Eyes that, despite thick-framed glasses, were the most gorgeous ones he had ever seen. Eyes that changed colors from searching to flustered to embarrassed, all in a moment's time.

He smiled, she blushed. And that was the day they found their connection.

*sigh* If only I didn't have to work in such mysterious ways!

Wednesday, September 11, 2013

"सोचते बहुत हो तुम!"

It's 
"सोचते बहुत हो तुम!"
"तो, उसमें क्या बुराई है? दिमाग़ की माँसपेशियाँ बढ़ती हैं … और सोच भी तो तुम्हारे बारे में ही रहा हूँ ।"
"अच्छा, क्या?"
"सोच रहा था, कि जब तुम सोती होगी और सूरज की रोशनी तुम पर पड़े, तो तुम्हारे भूरे बाल और हल्के रंग के दिखते होंगे, और तुम्हारी पलकें गालों पर कैसी परछाइयाँ बनाती होंगी।"
"ये… बातें बनाने का कोई नया डिप्लोमा लिया है क्या?"

लड़के का नाम है सागर, और अपने नाम को सार्थक करते हुए वो हर वक़्त रूमानियत के सागर में गोते लगाता रहता है । लड़की का नाम है अनुपमा, और उसके पैर हक़ीक़त की ज़मीन पे मजबूती से जमे हैं । इसके बावजूद, तकरीबन एक साल की कड़ी मेहनत के बाद सागर उसके करीब आने में कामयाब हो ही गया । कड़ी मेहनत इसलिए, कि कॉलेज में वैसे ही लड़कियाँ गिनी-चुनी सी हैं; और उन में से खूबसूरत, खुशमिजाज़ तो इक्का-दुक्का ही होंगी।उस पर अनुपमा प्यार-व्यार के ख़याल से भी कोसों दूर भागने वाली।

सागर -- शायर-मिजाज़, मदिरा-प्रेमी और थोड़ा लुच्चा; जिसका पसंदीदा काम है सोचना -- अमूमन हर चीज़ के बारे में, पर पिछले कुछ दिनों से, ज़्यादातर अनुपमा के बारे में । उसके सपनों में tom-boyish, हर वक़्त जीन्स-कुर्ते में रहने वाली अनुपमा सुबह की चाय बनाते हुए आसमानी सूती साड़ी में और शाम को उसका इंतज़ार करते हुए लाल चंदेरी की साड़ी में नज़र आती । कभी-कभी गुलज़ार की शायरी चुरा के सोच लेता, "तूने साड़ी में उरस लीं हैं चाभियाँ मेरे घर की" वगैरह….

नारी-सशक्तीकरण की बातें करने वाली और काफ़ी हद तक feminist अनुपमा हिंदी फिल्मों को खुलेआम पुरुष-प्रधान और ज़्यादातर lyrics को औरतों के objectification का दोषी पाती। तो इस तरह की बातें यूँ तो उसे नागवार गुज़रतीं, लेकिन सागर की हर बात प्यारी ही लगती।

सागर जानता था कि अनुपमा कितनी स्वच्छंद है, और इसके लिए उसकी बहुत इज्ज़त भी करता था । In fact, उसकी ये आज़ाद-ख़याली और उसका आत्म-सम्मान ही उसे कहीं ज़्यादा अभीष्ट बना देता था सागर के लिए -- वरना शक्लें तो बहुत देखीं थी उसने।

और इधर अनुपमा का कुछ और ही हाल था --- छोटी से छोटी बात पे अपने हक़ के लिए लड़ जाने वाली अनुपमा का दिल चाहता था सब बिना माँगे बलिहारी कर दे सागर पे। उसके दिन-रात सिर्फ़ सागर के ख़याल में कटते, और इंतज़ार का एक-एक मिनट सालों जैसा गुज़रता। ख़ुद पे ही हँसी आती थी.… कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि कोई उसकी इतनी बड़ी ज़रुरत बन जाएगा। बाक़ी सारे दोस्त, सारे शौक़, सब गए तेल लेने। लगता था इतने प्यार से दिल blast न हो जाए।

अब हुआ यूँ, कि इधर अनुपमा का पागलपन बढ़ रहा था, और उधर सागर का "need for personal space"। प्यार अब भी था, लेकिन ये हर वक़्त का प्यार उसे इमोशनल अत्याचार ज़्यादा लग रहा था।

ये सारा खेल सागर का दोस्त पंकज भी देख रहा था। आख़िर एक दिन उससे रहा नहीं गया, "क्या बात है भाई, आज-कल तो मैडम के रंग ही बदले हुए हैं! "
"हाँ.… पर मैं सोच रहा हूँ कि ये सब यहीं ख़त्म किया जाए। "
"पागल हो गया है? ऐसी लड़की इस कॉलेज में तो मिलने से रही तुझे। इसी के पीछे एक साल से भाग रहा था ! "
"मालूम है। पर अब मुझसे नहीं होता। जितना ही सोचता हूँ उतना ही डर लगता है। अभी से इसका ये हाल है तो आगे क्या-क्या होगा? पहले सोचता था कि पता नहीं इतनी आज़ाद लड़की handle होगी कि नहीं; अब सोचता हूँ कि कहाँ है वो लड़की जिसकी जिसकी दुनिया मेरे इर्द-गिर्द नहीं घूमती थी 24x7! ऐसी desperate हो जाएगी सोचा ही नहीं था। कुल मिला के जो सोचा था, वैसी है नहीं वो.… "

सागर को ख़ुद ही नहीं पता था वो ये सब सोच रहा है आज-कल।

[[Writer's note: In my mind, this post was quite different. Eventually it turned out to be something else altogether. Guess I'll go ahead and publish this one, and try to approach the original one at some time in future.]]

Tuesday, August 27, 2013

Two love stories

It's 
भाग - १ 

'मरवाओगी एक दिन तुम मुझे', मैं अक्सर उससे कहता था। वो - यानी मधुमिता - हवा की तरह आज़ाद और आँधी की तरह जिसकी ज़िन्दगी छुए उसे तबाह करने वाली। हम एक-दूसरे को नौ सालों से जानते थे, जब वो १७ साल की थी । और करीब-करीब इतने ही सालों से मैं उसको चाहता था, ये बात वो खुद भी जानती थी। और वो; इन नौ सालों में सात बार तो उसे 'सीरियस वाला' प्यार हो चुका था । ये ज़रूर था कि इन नयी मोहब्बतों के लम्बे-लम्बे किस्से हों, ब्रेक-अप पर टूटे दिल के टुकड़े या 'उस कमीने' को मारने के लम्बे-चौड़े प्लान्स - सब लेकर आना उसको मेरे ही पास होता था ।

लड़का जितना बड़ा कमीना हो, मधुमिता को उतना ही भाता था । उसका सबसे नया प्यार, सुधांशु, अव्वल दर्जे का निकम्मा था (खैर, मेरी तो उसके हर दोस्त के बारे में तक़रीबन यही राय थी) । पर जिस तरह से सुधांशु उससे से पेश आता था, कितनी ही बार मैंने खुद को उसको मारने से रोका होगा ।

वक़्त के साथ शायद कुछ अक़्ल मधुमिता में भी आ रही थी, या शायद सुधांशु के कमीनेपन का असर था; पर इन दिनों वो कुछ अलग ही नज़र आ रही थी । सुधांशु की दिन-ओ-दिन बढ़ती शिकायतों की लिस्ट छोटी होते-होते अब तक़रीबन ग़ायब हो चुकी थी । ये withdrawal symptoms मैं पहले भी देख चुका था। ये प्यार भी अब चंद ही दिनों का ही मोहताज था । पर साथ ही  कुछ था, जो हर बार से अलग था । उसका मुझसे बात करने का संजीदा लहज़ा, देखने का ढंग - पता नहीं क्या था, जो अब जब भी हम साथ होते, किसी नयी ही सतह पे दिल को छू जाता था ।

उन्ही दिनों, एक और बड़ी खुशख़बरी मुझे मिली । आख़िर जिस dream job के लिए मैं पिछले एक साल से तैयारी कर रहा था - वहां से बुलावा आ ही गया था । पंद्रह दिनों के अन्दर मुझे हैदराबाद के लिए निकलना था । उस रात हमने बहुत देर तक celebrate किया । रात के क़रीब दो बज रहे होंगे । हम फ़र्श पर लेटे हुए थे, हथेलियाँ ठन्डे संगमरमर को छूती हुईं --- उसको बहुत पसंद था । शायद नशे का असर था या उससे दूर जाने का ख़याल, अचानक ही मेरे मुँह से निकल गया - 'शादी करोगी मुझसे?' एक मिनट के लिए तो मैं खुद भी भौचक्का रह गया, इस बेवकूफ़ी पर । पर फिर लगा, एक न एक दिन तो कहना ही था, आज से अच्छा मूड और मौका कहाँ मिलता ।

उसके 'तुम पागल हो गए हो क्या?' ने मुझे वापस धरातल पर ला खड़ा किया, 'तुम्हे पता है मेरे और सुधांशु के बारे में!!'
'पर… तुम सीरियस ही कब होती हो?'
'इस बार हूँ… '
'पर वो एक नंबर का गधा है । तुम तो खुद ही कहती हो, he's a jerk?'
'शायद इसीलिए … मुझसे वजह मत पूछो, मैं खुद तुमसे इतने दिनों से बात करना चाहती थी । हर बार सब तुमसे ही बताया,
इस बार जब बताना सबसे ज़रूरी था, पता नहीं क्यूँ हिम्मत ही नहीं हुई । '

वो अब रो रही थी । मैंने हज़ार बार उसके आँसू पोंछे थे, पर आज पता नहीं क्यूँ बहुत चिढ़ सी हुई । लगा, कितनी खोखली है ये, मैं भी क्या सोच रहा था । बस, मैं उठा और कमरे में जा के दरवाज़ा भड़ाम से बंद कर दिया ।

वो हमारी आख़िरी मुलाक़ात थी ।
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भाग - २ 

हैदराबाद । नया शहर, नए लोग । पंद्रह रातों में जी भर रो कर और आत्महत्या के बारे में सोच-सोच कर दिल, दिमाग़ सब खाली हो चुका था । इस अजनबी शहर में आ कर उस खालीपन के अलावा कोई था भी नहीं मेरे दिन और रात भरने के लिए । ऐसे में मुझे मिली मीता । मीता - मेरी coworker - एक बच्चे के जैसी नादान और दुनिया की चालबाजियों से कोसों दूर । पहले-पहल तो मेरे cynical दिमाग़ को यक़ीन ही नहीं आया कि कोई इतना सुलझा हुआ भी हो सकता है - ख़ास तौर पर ऐसा ख़ुशशक्ल इंसान ।

मीता को मैंने सब कुछ बता दिया था, मधुमिता के character flaws को थोड़ा छुपाते हुए - क्यूंकि वो भी बता देने पर मैं निश्चित तौर पर गधा नज़र आता । एक बात ये भी थी, कि एक intense love story वाला background होने से मैं मीता के लिए कुछ ज्यादा desirable हो जाऊँगा और उसकी सहानुभूति पाना कुछ आसान, इतनी समझ थी मुझमें । एक बार को कुछ अपराध-बोध भी हुआ उसे ऐसे manipulate करते हुए, पर मैं दोबारा सब कुछ पा के हारना नहीं चाहता था, सिर्फ़ अपनी अच्छाई का भरम रखने के लिए ।

बहरहाल, ऐसी कोई नौबत आई नहीं और मीता को मुझसे प्यार भी हो गया, और हम में प्यार का इकरार भी हो गया ।मेरे मधुमिता के नौ साल के obsession को ग़ायब होते नौ हफ्ते भी नहीं लगे - हालाँकि मैं इसमें कुछ credit मधुमिता के खोखलेपन को भी देता हूँ । मन ही मन मैंने उसे Madame Bovary नाम से बुलाना शुरू कर दिया था । पता नहीं अचानक मधुमिता के लिए उपजी ये घृणा और मीता के लिए उमड़ा प्यार सच्चा था या सिर्फ़ एक reflex; पर मैं दिन में दस बार भगवन को शुक्रिया कहने को ज़रूर रुकता था, मेरी जान बचाने के लिए ।  मुझे अपनी ख़ुशकिस्मती पर यक़ीन ही नहीं हो रहा था -- मानो मेरे बिना कुछ किये-धरे किसी ने मेरी ज़िन्दगी का chaos हटा के सब कुछ क़रीने से सजा दिया हो ।मीता सिर्फ़ मेरी थी और मैं उसका ।


मीता के लिए किसी को अपने इतने क़रीब आने देना एक बहुत बड़ी बात थी । अपनी निज़ी ज़िन्दगी को लेकर वो बहुत ही guarded थी । तो जब अपने birthday पर उसने मुझे अपने घर पर बुलाया, ये उसके लिए  विश्वास का एक बड़ा क़दम था। उसका घर भी उसका ही एक extension था - सब कुछ क़ायदे से लगा हुआ, balcony में कुछ गमले, एक बड़ा सा bookshelf । हर चीज़ अपनी जगह पर । 'कमाल है! तुम अगर मधुमिता का घर देख लो तो पागल हो जाओ । वहां कुछ भी ढूँढ पाना impossible है' - ये बोलते हुए मैंने कुछ सोचा ही नहीं। 

बस, मानो एक ब्लास्ट ही हो गया । मीता को इतने गुस्से में मैंने कभी नहीं देखा था - 'तुमको पता भी है तुम क्या कर रहे हो? तुम मेरे बहाने हर दिन सिर्फ़ उसे याद कर रहे हो। वो ऐसा कहती है वो ऐसा करती है.… अच्छी-बुरी जैसी भी है, तुम्हारे दिमाग़ में सिर्फ़ वही है । मैं कुछ भी कर लूँ मुझे हमेशा एक yardstick से नापा जाएगा, और मैं उसके लिए तैयार नहीं हूँ । और मुझे नहीं लगता कि तुम खुद उसके अलावा अभी किसी और के लिए तैयार हो । ' इससे पहले कि मेरा ताज्जुब और गुस्सा ख़त्म हो, और मैं कुछ बोल पाऊं - 'एक बात और, मधुमिता ने तुमसे कभी झूठ नहीं बोला - तुमसे अच्छा-बुरा कभी कुछ नहीं छुपाया ।  इतना यक़ीन प्यार की हद है । '

------------

भाग - ३ 

उस दिन के बाद मीता और मैं कई बार मिले ।लेकिन जो एक दरार आ गयी थी, उसको भरना नामुमकिन था, ये हम दोनों जानते थे । इसलिए जब उसको US जाने का offer आया तो न उसने रुकने की इच्छा जताई, न मैंने उसको रोकने की कोशिश की । 

चार महीने और बीत गए, पर मधुमिता पर मेरा गुस्सा कम नहीं हो रहा था । और कितनी बार उसके चलते मुझे सब कुछ खोना पड़ेगा? 

तो इसलिए उस दिन जब घंटी बजने पर दरवाज़ा खोल, और सामने मधुमिता को देखा, तो एक बार कुछ कहते ही नहीं बना । I still hated her. दो साल हो गए थे, और ऐसे-कैसे वो बिना कुछ बताये, बिना पूछे, यहाँ चली आई है? किस अधिकार से? 

पहली बात उसने ही कही, 'ऐसे भी कोई जाता है बिना बताये, बिना पूछे? मरवाओगे एक दिन तुम मुझे!'

……………. 

Friday, May 17, 2013

Wo Shaam Kuchh Ajeeb Thi

It's 
She couldn't just barge in my house like that! It's been two years!

There she was, sitting in the balcony, sipping what seemed like one of Hitesh's concoctions, talking to him like they were long lost friends. Hitesh - my roommate, and more importantly, my drinking mate and her archenemy. On seeing me, Hitesh excused himself. Where did he learn these manners? Today was turning to be stranger by the minute.

I went after him.
"I thought you hated her", I said.
"She's not half bad!"
"Really? How do you figure?"
"We chatted."
"Just like that? What about all that talk of how she's a b*tch?"
"Well, the vodka helped."
"And you drank vodka! What's gotten into you?"

Grinning like a Cheshire cat, he slammed the door on my face. I had to pause, reign my thoughts before I could go back to the balcony and face her.

There she was, sitting like it was any other day. She nonchalantly, almost absent-mindedly, patted the chair asking me to sit down. As if I was the outsider in this house!

And then she started talking of movies. It was her only connection to the outside world. That, and cricket. She hardly talked of anything else, especially when she was nervous. There was no mention of what happened two years ago and ever since.

"Can I have another one of these?", she touched the empty glass. Her eyes already had the glassy, faraway look.

Meanwhile, Hitesh has taken to playing all sort of inappropriate songs, right from "Wo shaam kuchh ajeeb thi" to "Tum aa gaye ho, noor aa gaya hai". And when he played "Tere bina zindagi se koi shikwa to nahin", she said in a spot-on imitation of Suchitra Sen's voice "Do baras lambi thi na?" and started laughing.

Alcohol helped her loosen up. I was dreading 'the talk'. But she never brought it up. I was secretly glad that she was back like nothing had happened. And then she blurted, "I'm moving to Tennessee." I was shocked and probably heartbroken, I think, but the vodka ensured it didn't show on my face.

"Let's watch Before Sunset. We never got to watch it together.", she said. At this point, she was too drunk to understand any of it. But we had both watched it many times, so I played it and ordered pizza. We watched in silence till the pizza came. And then ate in silence. It was our movie, there was no need to say anything. And we were too wasted to be talking.

Midway the movie and the pizza, she fell asleep. At that moment, she didn't look that pretty. But she seemed perfectly at home, right in the middle of those half-filled glasses and half-eaten pizza; the flickering images from TV casting lights and shadows on her face. I knew she didn't want to leave. I just had to make her stay. And that, my lord, is when I killed her.

Wednesday, March 07, 2012

अमलतास

It's 
उसी अमलतास के तले बुलाना था मुझे आखिरी बार? हमारी कहानी का अंत कहीं और भी तो हो सकता था. 

उस आखिरी मुलाकात को कितनी बार दिमाग में रिप्ले किया होगा मैंने! 

साढ़े नौ साल बीत गए उस दिन को - कई शहर, कई साथी, कई मंजिलें - पर वक़्त-बेवक़्त आँखों के आगे तुम्हारा चेहरा  तैर जाता था, तो यूँ लगता था कि तमाम उम्र का दर्द एक झटके से सीने में उतर आया हो.

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तुम्हारा बस चलता तो हर दिन बस उसी अमलतास के रंग के कपड़े पहनाते मुझे! और शिफॉन से भी तो कुछ ज्यादा ही प्यार था ना तुम्हे उन दिनों? 

तुम भी भूले तो नहीं होगे मुझे! कहा करते थे, 'हमारी कहानी पे एक नॉवेल लिखा जा सकता है'. पर ऐसे सैड एंडिंग वाले नॉवेल ज्यादा बिकते नहीं. सोचती थी अब की बार मिलेंगे तो एक नया अंजाम देंगे इस कहानी को - उसी अमलतास के तले जो आज भी अपनी हैप्पी एंडिंग के इंतज़ार में है. 
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और फिर तुम्हारा उस शौपिंग कॉम्प्लेक्स में अचानक मिल जाना! तुम खुश से ज्यादा हैरान लग रहे थे मुझे देख कर, जैसे किसी भूत को देख लिया हो. बोलने की सारी ज़िम्मेदारी मुझपे ही डाल दी. खैर तुम हमेशा से ही कम बोलते थे और मेरे पास भी हज़ार बातें थी करने के लिए. मेरे लिए तुम्हारे "हाँ, हूँ" भी दुनिया भर के लोगों की तमाम बातों से बढ़कर थे हमेशा से.

तुम्हारे वज़न बढ़ जाने और कपड़े पहनने का अंदाज़ ना बदलने की बातों के दौरान, कब वो आ के खड़ी हो गयी मैंने देखा ही नहीं. मैं तो आसमान में उड़ रही थी. और जब तुमने उसका तार्रुफ़ करवाया तो लगा ग्रैविटी ने बड़ी ज़ोर से मुझे धरती पे वापस ला पटका. तो ये थी हमारी असल आखिरी मुलाक़ात. शुक्र है शौपिंग कॉम्प्लेक्स की गैर-रोमैंटिक ज़मीन पर थी.

बाई द वे, वो पीली शिफॉन की सारी काफ़ी फ़ब रही थी उस पर.

Wednesday, February 29, 2012

Hijr (Javed Akhtar)

It's 
कोई शेर कहूँ
या दुनिया के किसी मौज़ूं* पर
मैं कोई नया मज़मून* पढूँ
या कोई अनोखी बात सुनूँ
कोई बात
जो हँसने वाली हो
कोई फ़िक़रा* 
जो दिलचस्प लगे
या कोई ख़याल अछूता सा 
या कहीं मिले
कोई मंज़र
जो हैरां कर दे
कोई लम्हा
जो दिल को छू जाए
मैं अपने ज़हन के गोशों* में
इन सबको सँभाल के रखता हूँ
और सोचता हूँ
जब मिलोगे
तुमको सुनाऊँगा ।

[
हिज्र = separation
मौज़ूं = subject
मज़मून = article, write-up
फ़िक़रा = sentence
गोशों = corners
]
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